
यूरोप का छोटा-सा देश लिकटेंस्टीन इन दिनों भारत के साथ अपने बढ़ते संबंधों को लेकर चर्चा में है। यहां के प्रिंस एलॉइस चार दिवसीय भारत यात्रा पर आए हैं। इस दौरान वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात करेंगे। उनकी इस यात्रा का उद्देश्य व्यापार, निवेश, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग को मजबूत करना है। लेकिन इस दौरे के साथ ही लिकटेंस्टीन की अनोखी विशेषताओं ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। करीब 40 हजार की आबादी वाले इस देश में न तो कोई हवाई अड्डा है और न ही इसकी अपनी अलग मुद्रा। इसके बावजूद यह दुनिया के समृद्ध देशों में गिना जाता है।
आखिर क्यों खास है लिकटेंस्टीन?
लिकटेंस्टीन यूरोप में आल्प्स पर्वतों के बीच बसा एक छोटा-सा देश है। इसकी सीमा स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रिया से लगती है, जबकि इसकी राजधानी वाडुज़ है। आकार और आबादी में छोटा होने के बावजूद यह देश अपनी समृद्ध अर्थव्यवस्था और खूबसूरत प्राकृतिक नजारों के लिए जाना जाता है।
वर्ल्ड एटलस के हवाले से दी गई जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2026 में लिकटेंस्टीन की प्रति व्यक्ति जीडीपी (पीपीपी) लगभग 1,95,372 अमेरिकी डॉलर बताई गई। हालांकि, प्रति व्यक्ति जीडीपी का यह आंकड़ा औसत आर्थिक उत्पादन को दर्शाता है, न कि हर नागरिक की वास्तविक कमाई को।
लिकटेंस्टीन की एक और खास बात यह है कि यह स्विट्जरलैंड के साथ मौद्रिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। यहां स्विस फ्रैंक का इस्तेमाल किया जाता है और इसकी अपनी अलग राष्ट्रीय मुद्रा नहीं है। इसके बावजूद लिकटेंस्टीन एक स्वतंत्र और संप्रभु देश है।
न अपनी करेंसी, न एयरपोर्ट
लिकटेंस्टीन की सबसे दिलचस्प विशेषताओं में से एक यहां अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का न होना है। देश में आने वाले यात्री आमतौर पर स्विट्जरलैंड या ऑस्ट्रिया के हवाई अड्डों पर उतरते हैं और वहां से सड़क या रेल मार्ग के जरिए लिकटेंस्टीन पहुंचते हैं। बाल्ज़र्स में एक हेलीपोर्ट मौजूद है, लेकिन यहां कोई बड़ा एयरपोर्ट नहीं है।
इसके अलावा, लिकटेंस्टीन एक स्थलरुद्ध देश है, यानी इसकी कोई समुद्री सीमा नहीं है। इसलिए यहां समुद्री बंदरगाह भी नहीं है। छोटी आबादी और सीमित भौगोलिक क्षेत्र के बावजूद देश में सड़क और रेल परिवहन की सुविधाएं उपलब्ध हैं।
कब बना था लिकटेंस्टीन स्वतंत्र देश?
लिकटेंस्टीन का इतिहास काफी पुराना है। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, वर्ष 1719 में पवित्र रोमन साम्राज्य के अंतर्गत वाडुज़ और शेलनबर्ग के क्षेत्रों को मिलाकर लिकटेंस्टीन की रियासत बनाई गई थी।
नेपोलियन के दौर में इस क्षेत्र पर फ्रांसीसी प्रभाव रहा, लेकिन 1815 में लिकटेंस्टीन जर्मन परिसंघ का हिस्सा बना। वर्ष 1868 में परिसंघ के भंग होने के बाद देश ने अपनी छोटी सेना समाप्त कर दी। लिकटेंस्टीन आज भी अपनी अलग राष्ट्रीय पहचान और स्वतंत्र शासन व्यवस्था बनाए हुए है।
स्विट्जरलैंड के साथ इसके करीबी आर्थिक और प्रशासनिक संबंध हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि लिकटेंस्टीन स्विट्जरलैंड का हिस्सा है। यह अपनी सरकार और संवैधानिक व्यवस्था वाला स्वतंत्र देश है।
प्रिंस के हाथों में भी हैं अहम अधिकार
लिकटेंस्टीन में वंशानुगत संवैधानिक राजतंत्र है। यहां प्रिंस देश के राष्ट्राध्यक्ष होते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। देश की शासन व्यवस्था में राजकुमार, सरकार और संसद की महत्वपूर्ण भूमिकाएं हैं।
सरकार में प्रमुख और चार सरकारी पार्षद शामिल होते हैं। नियुक्ति की प्रक्रिया में संसद और प्रिंस की भूमिका होती है। देश की संवैधानिक व्यवस्था के तहत प्रिंस को कानून बनाने की प्रक्रिया में भूमिका निभाने, कुछ परिस्थितियों में वीटो करने और शाही आदेश जारी करने जैसे अधिकार भी प्राप्त हैं।
इस तरह लिकटेंस्टीन की शासन व्यवस्था में राजतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाएं दोनों शामिल हैं।
क्या है प्रिंस एलॉइस की भारत यात्रा का मकसद?
विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रिंस एलॉइस की चार दिवसीय भारत यात्रा का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच आर्थिक और तकनीकी सहयोग को बढ़ाना है। इस यात्रा में उनकी पत्नी प्रिंसेस सोफी और प्रमुख उद्योगपतियों का एक व्यापार प्रतिनिधिमंडल भी शामिल है।
दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के साथ मुलाकातों में व्यापार, निवेश, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार जैसे विषयों पर चर्चा होने की उम्मीद है।
विदेश मंत्रालय ने कहा है कि इस यात्रा से भारत और लिकटेंस्टीन के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों को और मजबूती मिल सकती है। खास तौर पर वर्ष 2025 में भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के बीच व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते (TEPA) के लागू होने के बाद आर्थिक सहयोग के नए अवसरों पर ध्यान दिया जा रहा है।
करीब 40 हजार की आबादी वाला लिकटेंस्टीन भले ही आकार में छोटा हो, लेकिन उसकी आर्थिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां उसे महत्वपूर्ण बनाती हैं। प्रिंस एलॉइस की भारत यात्रा से दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश संबंधों को आगे बढ़ाने के नए रास्ते खुलने की उम्मीद है।

