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लैब में जानवरों पर प्रयोग के नए नियमों पर विवाद, PETA ने जताई चिंता, सरकार से ड्राफ्ट मंजूर न करने की अपील

केंद्र सरकार की ओर से प्रयोगशालाओं में जानवरों के इस्तेमाल को लेकर प्रस्तावित नए नियमों पर विवाद शुरू हो गया है। सरकार इसे वैज्ञानिक अनुसंधान को तेज करने की दिशा में सुधार बता रही है, जबकि पशु अधिकार संगठन इसे जानवरों की सुरक्षा और स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था कमजोर करने वाला कदम मान रहे हैं। PETA इंडिया की साइंटिस्ट एंड रिसर्च पॉलिसी एडवाइजर अंजना अग्रवाल ने प्रस्तावित ड्राफ्ट की कई खामियां गिनाते हुए सरकार से इसे मंजूरी नहीं देने की अपील की है।

केंद्र सरकार ने इस संबंध में 6 अक्टूबर को ड्राफ्ट जारी किया था। इंडिया टीवी से बातचीत में अंजना अग्रवाल ने कहा कि यदि प्रस्तावित नियम लागू होते हैं तो संरक्षित वन्यजीव प्रजातियों को भी प्रयोगों के उद्देश्य से इस्तेमाल किए जाने का खतरा बढ़ सकता है। उन्होंने चिंता जताई कि रिसर्च करने वाले संस्थानों को खुद ही प्रयोगों की मंजूरी देने और उनकी निगरानी करने का अधिकार मिलने से स्वतंत्र जांच की व्यवस्था कमजोर हो सकती है।

अंजना अग्रवाल के मुताबिक, प्रस्तावित ड्राफ्ट में निगरानी की जिम्मेदारी केंद्रीय स्तर की संस्था से हटाकर संस्थानों की अपनी एनिमल एथिक्स कमेटियों को देने की बात कही गई है। इससे संस्थान खुद ही अपने प्रयोगों को मंजूरी दे सकते हैं और उनकी निगरानी भी कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था में स्वतंत्र जांच और जवाबदेही प्रभावित होने की आशंका है।

उन्होंने यह भी कहा कि वन्यजीवों की मेडिकल हिस्ट्री और पहले से मौजूद बीमारियों की जानकारी नहीं होती। ऐसे में उन पर किए गए प्रयोगों से मिलने वाले वैज्ञानिक आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।

PETA की साइंटिस्ट ने बताया कि प्रयोगशालाओं में जानवरों को अक्सर छोटे पिंजरों में रखा जाता है, जहां उन्हें प्राकृतिक वातावरण और सामाजिक संपर्क नहीं मिल पाता। इससे उनमें तनाव, बेचैनी और अवसाद जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

उन्होंने कहा कि वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास से निकालकर लैब में रखना उनके लिए बेहद तनावपूर्ण होता है। कई बार जानवर पिंजरों में लगातार चक्कर लगाते हैं, खुद को नुकसान पहुंचाते हैं और बाहर निकलने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा कृत्रिम रोशनी और दिन-रात के प्राकृतिक चक्र में बदलाव से उनकी जैविक दिनचर्या यानी सर्केडियन रिदम भी प्रभावित होती है।

अंजना अग्रवाल ने बताया कि कई जानवर प्रयोग के दौरान ही मर जाते हैं, जबकि कुछ को प्रयोग पूरा होने के बाद इच्छामृत्यु दे दी जाती है। हालांकि, भारत में नियमों के अनुसार प्रयोग के बाद जानवरों की देखभाल, पुनर्वास और जहां संभव हो, उन्हें गोद देने की व्यवस्था होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था को लेकर देश में पर्याप्त सार्वजनिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। केंद्रीय पशु प्रयोग नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण समिति (CCSEA) की जिम्मेदारी है कि वह इस संबंध में जानकारी उपलब्ध कराए, लेकिन इसका विस्तृत सार्वजनिक डेटाबेस मौजूद नहीं है।

अंजना अग्रवाल ने जानवरों पर किए जाने वाले प्रयोगों की वैज्ञानिक उपयोगिता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने 2024 में प्रकाशित एक मेटा-एनालिसिस का हवाला देते हुए दावा किया कि जानवरों पर किए गए प्रयोगों से जुड़ी करीब 95 प्रतिशत स्टडीज मानव क्लीनिकल ट्रायल के चरण तक पहुंचने पर सफल नहीं हो पातीं। उनके मुताबिक, केवल लगभग 5 प्रतिशत ही आगे नियामक मंजूरी हासिल कर पाती हैं।

उन्होंने कहा कि जानवरों और इंसानों की जैविक संरचना अलग-अलग होती है। ऐसे में किसी दवा का जानवरों पर सफल होना इस बात की गारंटी नहीं देता कि वह इंसानों पर भी उतनी ही प्रभावी होगी। इसके अलावा प्रयोगों के दौरान जानवरों को होने वाला तनाव भी रिसर्च के नतीजों को प्रभावित कर सकता है।

अंजना ने कहा कि विज्ञान और तकनीक में तेजी से हो रही प्रगति के कारण अब कई प्रयोगों में जानवरों पर निर्भरता कम की जा सकती है। इसके लिए ऑर्गन-ऑन-चिप, ऑर्गेनॉइड्स, कंप्यूटेशनल मॉडल, सॉफ्टवेयर सिमुलेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि भारत में भी कई संस्थान नॉन-एनिमल रिसर्च के तरीकों पर काम कर रहे हैं। मेडिकल एजुकेशन और ट्रेनिंग में भी सिमुलेशन मॉडल का इस्तेमाल बढ़ रहा है। इन तकनीकों को प्रोत्साहित करके वैज्ञानिक अनुसंधान जारी रखा जा सकता है और जानवरों को प्रयोगों से बचाया जा सकता है।

अंजना अग्रवाल ने कहा कि भारत ने 2014 में कॉस्मेटिक टेस्टिंग के लिए जानवरों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाकर अच्छी पहल की थी, लेकिन इसके बाद नॉन-एनिमल रिसर्च के क्षेत्र में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई।

उन्होंने अमेरिका और यूरोपीय संघ का उदाहरण देते हुए कहा कि कई देश जानवरों पर प्रयोगों की निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं। अमेरिका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) ने भी 2035 तक केमिकल टेस्टिंग में स्तनधारी जानवरों के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने का लक्ष्य रखा है।

प्रस्तावित नियमों में तीन अहम बदलावों के बारे में पूछे जाने पर अंजना अग्रवाल ने कहा कि PETA इंडिया चाहता है कि मौजूदा ड्राफ्ट को मंजूरी ही नहीं दी जाए। इसके बजाय एक मजबूत नियमावली तैयार की जानी चाहिए, जिसमें जानवरों की सुरक्षा के प्रावधान बढ़ाए जाएं और नॉन-एनिमल रिसर्च तकनीकों को अधिक से अधिक बढ़ावा मिले।

उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान को आगे बढ़ाना जरूरी है, लेकिन इसके लिए जानवरों की सुरक्षा और स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था से समझौता नहीं किया जाना चाहिए।

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