नई दिल्ली। देश की राजनीति में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का विस्तार पिछले एक दशक में तेज़ी से हुआ है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 के बाद भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों ने कई राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत की है।
2014 में जहां भाजपा और उसके सहयोगी दलों की सीमित राज्यों में सरकार थी, वहीं अब यह संख्या बढ़कर दो दर्जन के करीब पहुंच चुकी है। इसके उलट भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके सहयोगियों का प्रभाव कई राज्यों में घटा है।
पूर्वोत्तर राज्यों, खासकर असम में भाजपा ने लगातार अपनी स्थिति मजबूत की है। यहां हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में पार्टी ने संगठन और रणनीति के दम पर चुनावी सफलता हासिल की है।
इसी तरह पश्चिम बंगाल में भी भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी राजनीतिक मौजूदगी को बढ़ाया है, हालांकि राज्य की राजनीति में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस अभी भी एक प्रमुख ताकत बनी हुई है।
तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से द्रविड़ दलों के इर्द-गिर्द रही है, जिसमें द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और AIADMK का दबदबा रहा है।
हाल के वर्षों में यहां नए राजनीतिक विकल्पों और चेहरों के उभरने की चर्चा तेज हुई है, जिनमें फिल्म जगत से जुड़े नाम भी शामिल हैं, जैसे जोसेफ विजय। हालांकि राज्य की सत्ता में बदलाव को लेकर ठोस निष्कर्ष चुनावी परिणामों पर ही निर्भर करते हैं।
विश्लेषकों के अनुसार भाजपा के विस्तार में संगठनात्मक मजबूती, चुनावी रणनीति और नेतृत्व की अहम भूमिका रही है। अमित शाह को पार्टी के चुनावी प्रबंधन और बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करने का श्रेय दिया जाता है।
वहीं विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती एकजुटता और मजबूत नेतृत्व का अभाव माना जाता है।
आने वाले समय में उत्तर प्रदेश, पंजाब और अन्य राज्यों के चुनाव देश की राजनीति की दिशा तय करेंगे। राजनीतिक दल अभी से अपनी रणनीति बनाने में जुटे हैं।
देश की राजनीति लगातार बदल रही है। एक ओर जहां NDA अपना विस्तार कर रहा है, वहीं विपक्ष नए विकल्प और रणनीति तलाश रहा है। आने वाले चुनाव यह तय करेंगे कि यह रुझान जारी रहता है या इसमें बदलाव आता है।

