शीला दीक्षित की प्रासंगिकता

हम यह नहीं कहते कि कांग्रेस को भाजपा से सीख लेनी चाहिए लेकिन इस पार्टी को अपने इतिहास के पन्ने तो पलट कर देखने ही चाहिए। आज जिसे हम अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी कहते हैं, वो वास्तव में कांग्रेस (इन्दिरा) हैं। सत्तर के दशक में जब कांग्रेस को श्रीमती इन्दिरा गांधी ने अपने हाथ में लिया था, तब बुजुर्गों को किनारे कर दिया गया था। इण्डीकेट और सिण्डीकेट को दूसरे लोग भूल जाएं तो भूल जाएं लेकिन मौजूदा समय की कांग्रेस को नहीं भूलना चाहिए। एक तरफ कांग्रेस में राहुल गांधी को अध्यक्ष पद न छोड़ने के लिए मनाया जा रहा है और श्रीमती प्रियंका गांधी वाड्रा को इस बात के लिए तैयार किया जा रहा है कि वह यूपी में सीएम पद का चेहरा बन जाएं तो ऐसी कौन सी जरूरत पड़ गयी थी जो 80 वर्ष से ऊपर की हो चुकी श्रीमती शीला दीक्षित को फिर से दिल्ली प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। इतना ही नहीं पार्टी के कई नेता चाहते थे कि दिल्ली में लोकसभा चुनाव आम आदमी पार्टी (आप) के साथ मिलकर लड़ा जाए, तब श्रीमती शीला दीक्षित ने ही इसका विरोध किया था। उनके विरोध को कांग्रेस हाईकमान ने स्वीकृति भी दे दी। अब यदि यह कहा जा रहा है कि यदि आप के साथ गठबंधन करके कांग्रेस दिल्ली में चुनाव लड़ती तो एक-दो सांसद मिल जाते। यह उम्मीद भी मौजूदा नतीजों से तो अच्छी है जहां एक भी सांसद कांग्रेस को नहीं मिला जबकि लगभग 10 विधान सभा क्षेत्रों में कांग्रेस प्रत्याशी ने भाजपा के प्रत्याशी से ज्यादा वोट प्राप्त किये हैं।
संभवतः यही बात है कि आज दिल्ली में कांग्रेस दो गुटों में बंटी नजर आ रही है। कांग्रेस के नेता इशारों -इशारों में सब कुछ कह देते हैं। लोकसभा चुनाव में दिल्ली में करारी हार के बाद भी कांग्रेस मोदी से सबक लेने को तैयार नहीं है। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने जिस तरह कांग्रेस को युवा बनाया था, उसी तरह भाजपा के कुछ बुजुर्ग नेता स्वयं चुनाव के मैदान से हट गये और कुछ हटा दिये गये। कांग्रेस ने बुजुर्गों को तरजीह दी। शीला दीक्षित कोई करिश्मा नहीं दिखा पायीं तो उनके खिलाफ अभियान शुरू हो गया। उनका भी अपना गुट है। दोनों गुट एक-दूसरे के खिलाफ अभियान छेड़े हैं। कांग्रेस का एक गुट दिल्ली प्रभारी पीसी चाको का इस्तीफा मांग रहा है तो दूसरा गुट कहता है कि लोकसभा चुनाव में पराजय को लेकर जब राहुल गांधी पद छोड़ने को तैयार हैं तो श्रीमती शीला दीक्षित स्वयं पद छोड़ दें और यदि वे पद नहीं छोड़ती हैं तो उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया जाए। गत 14 जून को ही दिल्ली प्रदेश कांग्रेस प्रभारी पीसी चाको के इस्तीफे को लेकर जमकर हंगामा हुआ था। संभवतः इसी की प्रतिक्रिया है कि पूर्व विधान सभा अध्यक्ष पुरुषोत्तम गोयल समेत कई जिलाध्यक्षों ने राहुल गांधी को पत्र लिखा है। इस पत्र में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष श्रीमती शीला दीक्षित को पद से हटाने की मांग की गयी है। गोयल ने तो यहां तक कह दिया कि यूपी और दिल्ली में शीला दीक्षित ने बेड़ा गर्क किया है। ध्यान रहे कि 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने श्रीमती शीला दीक्षित को ही मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था।
यहां पर ध्यान देने की बात यह भी है कि लोकसभा चुनाव से पहले ही श्रीमती शीला दीक्षित और पीसी चाको के बीच तालमेल ठीक नहीं था। पीसी चाको का मानना था कि दिल्ली के लोकसभा चुनाव आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर लड़े जाएं क्योंकि यहां पर मुख्य प्रतिद्वन्दी भाजपा थी। अलग-अलग लड़ने से भाजपा विरोधी मतों में विखराव हुआ। श्रीमती शीला दीक्षित आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन के खिलाफ थीं। सीटों के बंटवारे का मामला तो पीछे छूट गया था, पूर्व मुख्यमंत्री नहीं चाहती थीं कि आपसे मिलकर कांग्रेस चुनाव लड़े। राहुल गांधी के सामने दोनों ही नेताओं ने अपने-अपने विचार रखे लेकिन राहुल गांधी ने श्रीमती शीला दीक्षित को वरीयता दी। कांग्रेस ने दिल्ली में अकेले दम पर चुनाव लड़ा। नतीजा यह रहा कि सात में से एक भी सीट कांग्रेस को नहीं मिली। नतीजे की समीक्षा कई बार हो चुकी है। गत 14 जून को कांग्रेस के पूर्व पार्षद रोहित मनचंदा ने प्रदेश कांग्रेस प्रभारी पीसी चाको पर दुव्र्यवहार करने तक का आरोप लगाया। इससे पहले रोहित मनचंदा सोशल मीडिया पर पीसी चाको की खिंचाई करते रहे हैं। उन्होंने पीसी चाको से इस्तीफे की भी मांग की थी।
इसकी प्रतिक्रिया होनी थी। अगले ही दिन पीसी चाको ने प्रदेश अध्यक्ष शीला दीक्षित और तीनों कार्यकारी अध्यक्षों की बैठक बुलाई। इस दौरान रोहित मनचंदा और पीसी चाको का आमना-सामना भी हुआ। इसके बाद पीसी चाको ने रोहित मनचंदा से सीधे सवाल पूछा कि वे सोशल मीडिया पर इस तरह के पार्टी विरोधी कमेन्ट क्यों दे रहे हैं। इतना पूछते ही मनचंदा और पीसी के बीच कहा सुनी के बाद धक्का-मुक्की तक हुई। रोहित मनचंदा आरोप लगाते हैं कि पीसी चाको को वे रिसीव करने गये थे लेकिन उन्होंने लिफ्ट में धक्का मारकर बाहर निकाल दिया। इस प्रकार दिल्ली में कांग्रेस की गुटबाजी सड़क पर आ गयी है और ऐसे हालात में दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस कैसे बेहतर नतीजे ला सकती है। लोकसभा चुनाव में इतना साफ हो चुका है कि लगभग 10 विधान सभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां कांग्रेस भाजपा पर भारी पड़ी है। इनमें मुस्लिम बहुल क्षेत्र हैं।
दिल्ली में इस बार भाजपा की निगाह विधानसभा में भगवा फहराने की है। दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष सांसद मनोज तिवारी ने दिल्ली में भाजपा की शानदार विजय के बाद कहा भी था कि अब हमारा लक्ष्य दिल्ली विधान सभा के चुनाव जीतना है। भाजपा का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को इस बार अकेले ही जोर आजमाइश करनी है और यह फैसला ठीक भी है लेकिन पार्टी में नेता के खिलाफ ही बगावत हो रही है तो श्रीमती शीला दीक्षित जो भी मुद्दे उठाएंगी, उनकी धार कुंद हो जाएगी। मामले भी ऐसे उठाए जा रहे हैं, जिनको आम आदमी पार्टी उठा चुकी है। अभी 18 जून को श्रीमती शीला दीक्षित ने दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल को पत्र लिखकर क्षेत्र में बढ़ते अपराधों को लेकर चिंता जतायी। दिल्ली पुलिस पर नियंत्रण केन्द्र सरकार का है और पुलिस को लेकर अरविन्द केजरीवाल धरना तक दे चुके हैं। श्रीमती शीला दीक्षित ने मुखर्जीनगर इलाके में एक टेम्पोचालक की पुलिस कर्मियों द्वारा कथित पिराई का मामला उठाया है। उसे आम आदमी पार्टी पहले ही उठा चुकी हैं कांग्रेस के कुछ नेता कहते हैं कि बुजुर्ग नेतृत्व से इससे ज्यादा अपेक्षा क्या करेंगे? यह श्रीमती शीला दीक्षित की राजनीति में खत्म हो रही प्रासंगिकता को दर्शाता है। (हिफी)

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