अयोध्या बाबरी मस्जिद से जुड़ी क्या है ये दिलचस्प जानकारी, पढ़ें यहाँ ..

17 नवंबर को देश के सबसे चर्चित और विवादास्पद ‘राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद’ मुद्दे का फैसला आना है। सबकी निगाहें सर्वोच्च न्यायालय की ओर लगी हुई हैं। सदियों से बिखरे इस विवाद को समेटने की कोशिश है यह सीरिज- ‘अयोध्यानामा’। पहली कड़ी में बाबरी मस्जिद…

ऐसा बहुत कम होता है, जब अदालत के किसी फैसले पर पूरे देश की निगाहें लगी हों। अदालत है-सर्वोच्च न्यायालय। मामला है-राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद। यह विवाद दो पक्षों में है। हिंदू इसे अपने आराध्य राम की जन्मभूमि मानते हैं। मुसलमान इसे अपनी इबादतगाह। एक पक्ष का मानना है कि यह मस्जिद मंदिर तोड़कर बनाई गई थी। दूसरा पक्ष इससे इनकार करता है। एक के लिए यह आस्था और विश्वास का मामला है तो दूसरे के लिए भी यह इससे कम नहीं है। मुद्दे की बात यह है कि इस पर अपना दावा कौन छोड़े। दिक्कत सारी यही है कि छोड़ने को कोई तैयार नहीं है।

बहरहाल आगे बढ़ते हैं। इस मुद्दे को समझा जाए। इसके इतिहास को जाना जाए। कैसे एक मुद्दा लगभग 500 साल से जिंदा है। इतनी लंबी उम्र कि पीढ़ियों की पीढ़ियां ही बीत गई। कैसे एक बादशाह एक धर्मस्थल के नाम पर लोगों के जेहन में आज भी जिंदा है। इसलिए जरूरी है कि उसकी बनाई मस्जिद से पहले थोड़ा उसके बारे में जाना जाए।

1526 में पानीपत के मैदान में दिल्ली सल्तनत के अंतिम सुल्तान इब्राहिम लोदी को हराकर बाबर ने भारत में मुगल वंश की नींव रखी। उसने इस देश पर 1526 से 1530 तक राज किया। अपने शासनकाल में उसने जो किया, वो किया। लेकिन आज इस देश के आम लोग उसे सिर्फ और सिर्फ बाबरी मस्जिद के नाम पर जानते हैं। एक ऐसा निर्माण जो विवादों और विध्वंस का प्रतीक है। जो आज भी भाई-चारे और अमन के बीच जब-तब सवालिया निशान के रूप में खड़ा हो जाता है।

इसकी अगली कड़ी मीर बाकी यानी बाबर का सेनापति था। यही वो सेनापति था, जिसने एक निर्माण को विवाद की जन्मभूमि के रूप में तैयार किया। इस विवाद के परिणाम को पीढ़ियां आज तक भोग रही हैं। माना जाता है कि बाबर ने इसे अवध सूबे का गवर्नर बनाया था। और इसी मीर बाकी ने एक मस्जिद बनाई थी, जिसे बाबरी नाम दिया। कुछ इसे 1527 का निर्माण बताते हैं, कुछ 1528 का। बहरहाल माना जाता है कि बाबरी मस्जिद मीर बाकी ने बनवाई थी।

सिर्फ इतना ही नहीं कि हिंदू और मुस्लिम ही इसके पक्षकार हैं। एक पक्ष और है, वह है-बौद्ध। इस मामले में अयोध्या में रहनेवाले एक याचिकाकर्ता विनीत कुमार मौर्य भी शामिल हैं। उनका मानना है कि आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की खुदाई के दौरान मिले गोलाकार स्तूप, दीवार और खंभे यह दर्शाते हैं कि यह बौद्ध विहार था। उनका मानना है कि वह इस मामले के तीसरे पक्षकार हैं। इनका कहना है कि वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर ही न्यायालय ने इनकी याचिका स्वीकार की है। 

इसके अलावा पुरातात्विक स्रोतों, बौद्ध साहित्य और चीनी यात्रियों के यात्रा वृतांत भी यही बताते हैं कि यह एक बौद्ध स्थल है। यही नहीं, याचिकाकर्ता ने न्यायालय से यह अपील भी की है कि वह इस विवादास्पद स्थल को बौद्ध विहार घोषित करे। दावा तो यह भी किया जा रहा है कि राजा प्रसेनजीत के समय यह साकेत (अयोध्या) कहलाता था। बड़ी बात यह है कि दावे और दावेदारों की कमी नहीं है। बस, अगर कुछ कमी है तो वह है सदभाव की। इस मस्जिद से जुड़ी एक दिलचस्प बात यह है कि 1940 से पहले इसे ‘मस्जिद-ए-जन्म अस्थान’ कहा जाता था। इस स्थान को भगवान राम की जन्मभूमि के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है।

पहली बार हिंसा

1853 में मंदिर-मस्जिद विवाद को लेकर पहली बार हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हिंसा हुई। हिंदुओं ने आरोप लगाया कि भगवान राम के मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ।

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