नीतीश कुमार की रणनीति

बिहार में विधान सभा के चुनाव ही अब नीतीश कुमार की प्राथमिकता में है, इसी के चलते उनकी पार्टी रणनीति बना रही है। नरेन्द्र मोदी की पार्ट-2 सरकार में जद(यू) को साझीदार न बनाने के पीछे भी यह लक्ष्य है। जद(यू) नेता केसी त्यागी ने साफ-साफ कह दिया कि हम धारा-370 जैसे मामलों का विरोध करते हुए राजग के साथ रहेंगे। बिहार में ही हम राजग के साथ हैं, बाकी राज्यों में अलग अस्तित्व रहेगा। जद(यू) के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी ने साफ कहा है कि हमारी पार्टी दिल्ली, झारखण्ड, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा के विधान सभा चुनाव भाजपा के साथ मिलकर नहीं लड़ेगी। धारा 370 काॅमन सिविल कोड और अयोध्या विवाद जैसे मामलों पर उनकी पार्टी जद(यू) का रूख भाजपा से अलग है। इतना सब होते हुए भी उनकी पार्टी राजग के साथ ही रहेगी। इस प्रकार नीतीश कुमार न तो भाजपा का साथ ही छोड़ना चाहते हैं और न उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलना उन्हें पसंद है। राजनीति के पक्के खिलाड़ी नीतीश कुमार ने लालू यादव ही नहीं शरद यादव और जार्ज फर्नांडीज जैसे दिग्गजों को भी पटकनी दे दी। अब भाजपा के दिग्गज अमितशाह और नरेन्द्र मोदी से मुकाबला है लेकिन यह एक तरह का शीत युद्ध है।
यह शीत युद्ध 23 मई से शुरू हुआ है। इसी दिन लोकसभा चुनाव के नतीजे घोषित हुए थे और देश के कई लोगों की तरह नीतीश कुमार को भी इस बात से झटका लगा था कि भाजपा के पक्ष में इस बार लहर ही नहीं बल्कि सुनामी आ गयी। अकेले भाजपा को 303 सांसद मिल गये। कांग्रेस तो कहीं उसके सामने ठहर ही नहीं पायी। भाजपा को इस प्रकार से प्रचण्ड बहुमत मिलना विपक्षी दलों के साथ सहयोगी दलों को भी खटका। पंजाब में भाजपा ने अकाली दल बादल के साथ मिलकर सरकार बनायी थी लेकिन कांग्रेस ने वहां सत्ता पर कब्जा कर लिया। भाजपा ने प्रकाश सिंह बादल और उनके बेटे सुखवीर बादल की हर बात मानी। यहां तक कि भाजपा ने वहां उपमुख्यमंत्री पद की मांग की तब शिरोमणि अकाली दल ने भाजपा को टका सा जवाब दे दिया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने अपने बेटे सुखवीर को उपमुख्यमंत्री बनाया था। आज वहां के हालात बदल गये। भाजपा के पास भी दो सांसद हैं और शिरोमणि अकाली दल के पास भी दो ही सांसद हैं। पंजाब में 13 सीटों में से 8 पर कांग्रेस का कब्जा रहा है। इस प्रकार पंजाब में अब भाजपा शिरोमणि अकाली दल का सम्मान जरूर कर रही है लेकिन उसकी बराबरी पर खड़ी है।
बिहार में भी ऐसे ही हालात आ सकते हैं। अमितशाह बहुत दिनों तक नीतीश कुमार को ही सीएम की कुर्सी पर नहीं बैठने देंगे, वहां भाजपा के सुशील मोदी डेढ़ दशक से इंतजार कर रहे हैं। श्री मोदी ने लोकसभा चुनाव में राजग के सहयोगियों को नाराज करके भी नीतीश की पार्टी को अपने बराबर सीटें दी थीं। बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से भाजपा को 17 और जद(यू) को 16 सांसद मिले हैं। राजग के सहयोगी रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा को 6 तथा एक सांसद कांग्रेस को मिला। जद(यू) को 2014 में हालांकि 2 सांसद ही मिले थे लेकिन बिहार में नीतीश कुमार को ही चेहरा माना जाता है। मत प्रतिशत से देखा जाए तो भाजपा ने 23.7 फीसद मत पाये हैं और जद(यू) को सिर्फ 15.4 फीसद मत मिले हैं। इससे ज्यादा तो 2014 में जद(यू) को मत मिले थे जब उसे सिर्फ दो सांसद मिल पाये थे। इसी गणित ने जद(यू) और उससे नेताओं को आश्चर्य में डाल रखा है। जद(यू) अभी एनडी से अलग भी नहीं होना चाहता है लेकिन उससे दूरी भी बनाये रखना चाहता है। बिहार में 2020 में विधान सभा के चुनाव होने हैं। जद(यू) के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी अभी यही कह रहे हैं कि बिहार में चुनाव हम साथ-साथ लड़ेंगे लेकिन
गठबन्धन सिर्फ बिहार में ही रहेगा। गत दिनों पटना के एक अणे मार्ग के लोकसंवाद में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में जद(यू) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई थी। इस बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी, 21 राज्यों में अध्यक्ष समेत राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 91 सदस्य भी मौजूद थे। इस बैठक से पहले ही जब भाजपा ने प्रतीकात्मक भागीदारी देते हुए जद(यू) के एक सांसद को मंत्री बनाने की पेशकश की थी, तब पहले केसी त्यागी और बाद में नीतीश कुमार ने इस आग्रह को आदर के साथ ठुकरा दिया था। यह भाजपा के प्रति जद(यू) की नाराजगी का संकेत था। बाद में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अन्य फैसले लिये गये। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी, राष्ट्रीय महासचिव संजय झा, पवन वर्मा और अफाक अहमद ने मीडिया को जानकारी दी। उन्होंने बताया कि हम दिल्ली, झारखण्ड, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में विधान सभा चुनाव अपने दम पर मजबूती से लड़ेंगे। दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार है लेकिन लोकसभा चुनाव में उसे एक भी सांसद नहीं मिला है। सात के सात सांसद भाजपा को मिले हैं। यहां पर जद(यू) को भाजपा के साथ टकराना होगा। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस तो मुकाबले में ही नहीं दिख रहे हैं। अन्य जिन राज्यों में चुनाव होना है, उनमें मौजूदा समय में भाजपा की सरकारें हैं और जम्मू कश्मीर मंे महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडी पी से नाता तोड़कर भाजपा ने वहां राष्ट्रपति शासन लागू करवा दिया था। गृहमंत्री अमितशाह ने जम्मू-कश्मीर में विधानसभा और लोेकसभा सीटों का परिसीमन फिर से करवाने की बात कही है। अभी इस मामले में ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन जम्मू में आबादी को देखकर परिसीमन हुआ तो यहां से विधायक जुटाकर ही सरकार बनायी जा सकती है। जद(यू) यहां पर भाजपा का विरोध करेगी। यही स्थिति झारखंड और छत्तीसगढ़ मंे होगी। इन दोनों राज्यों मेें भाजपा की सरकार है। जद(यू) को यहां भाजपा की आलोचना करनी पड़ेगी।
जद(यू) नेताओं के लिए अब यह जरूरी हो गया है। आने वाले समय में भाजपा के टारगेट पर वे सभी राज्य हैं जहां अब तक भगवा नहीं फहराया जा सका है। बिहार में भगवा पूरी तरह नहीं लहर पा रहा है। इसलिए नीतीश और पार्टी के अन्य नेता सावधान रहना चाहते हैं। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के समय यह तय हुआ कि राष्ट्रीय पार्टी बनने की और अग्रसर जद(यू) 2020 में इस लक्ष्य को हासिल कर लेगा। इसीलिए भाजपा से हटकर नीति बनायी गयी है। श्री केसी त्यागी ने कहा था कि अनुच्छेद 370, समान नागरिक संहिता, राममन्दिर निर्माण जैसे विवादित मुद्दों पर अगर केन्द्र की सरकार कोई निर्णय लेती है तो जद(यू) को इनका विरोध करना पड़ेगा। इसी के चलते जद(यू) ने केन्द्रीय मंत्रिमंडल से दूरी बनाकर रखी है। केन्द्र में भागीदारी को लेकर भी जद(यू) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी को कहा गया कि बिहार की सरकार में भाजपा को समानुपातिक मंत्री दिये गये हैं वहां किसी प्रकार का सिम्बालिक प्रतिनिधित्व नहीं है। इसीलिए जद(यू) बाहर से केन्द्र सरकार को समर्थन दे रहा है। केसी त्यागी ने इस बात का भी विशेष रूप से उल्लेख किया कि नगालैण्ड में जद(यू) के एक विधायक के समर्थन से ही भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिला है। जद(यू) की यह भी दबाव की रणनीति है। (हिफी)

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