रोचक हो सकता है दिल्ली विधानसभा चुनाव

दिल्ली में एक बार फिर इतिहास अपने को दोहराएगा, ऐसी संभावना तो नहीं दिख रही है लेकिन 8 महीने बाद होने वाले दिल्ली विधान सभा के चुनाव निश्चित रूप से रोचक हो सकते हैं। भाजपा ने 2014 में संसद के चुनावों मंे जबर्दस्त सफलता प्राप्त की थी लेकिन 8 महीने बाद ही वहां विधानसभा के चुनाव हुए तो आम आदमी पार्टी (आप) को 70 में से 67 सीटें मिलीं। भाजपा दूसरे स्थान पर जरूर रही थी लेकिन उसे सिर्फ तीन विधायक मिल पाये थे। कांग्रेस का तो पूरी तरह से सफाया हो गया था। इस बार 2019 में लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उससे भी बढ़कर समर्थन पाया। दिल्ली के सात में सात सांसद 2014 मंे भी मिले थे और 2019 में भी मिले हैं लेकिन भाजपा ने भी दिल्ली की जनता के मिजाज को अबूझ पहेली मान लिया है। अभी कुछ ही दिन पहले विपक्ष का सूपड़ा साफ करने वाली भाजपा ने दिल्ली में विधान सभा की 70 सीटों में 60 को ही जीतने का लक्ष्य रखा है। उधर कांग्रेस को सांसद नहीं मिले लेकिन मत प्रतिशत के हिसाब से उसे दूसरे स्थान का दर्जा मिला है और सत्तारूढ़ आप तीसरे दर्जे पर है। बिहार मंे भाजपा की सहयोगी जद(यू) ने भी कह दिया है कि बिहार से बाहर वह राजग के साथ नहीं रहेगी। इसका मतलब दिल्ली में जद(यू) भी लड़ेगी।
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी से पराजित हो गयी हैं लेकिन विधान सभा चुनाव में मुकाबले को तैयार दिख रही है। भाजपा और आम आदमी पार्टी से टकराने के लिए बूथ स्तर पर तैयारी शुरू कर दी हैं जनता की समस्याओं को जोर शोर से उठाने लगी है। गत 12 जून को ही इन्होंने मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से मुलाकात की। श्रीमती शीला दीक्षित का कहना है कि केजरीवाल की सरकार ने बिजली कंपनियों को फायदा पहुंचाया है। बिजली के फिक्सड चार्ज, जिसमें दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग (डीईआरसी) ने मार्च 2018 में इजाफा किया था, उससे बिजली कंपनियों को लगभग 7 हजार करोड़ रुपये का फायदा हुआ। श्रीमती शीला दीक्षित का कहना है कि इस पैसे को दिल्ली की जनता को वापस करना चाहिए। इस प्रकार कांग्रेस ने एक बड़ा मुद्दा अपने हाथ में लपक लिया है। इस मामले पर भाजपा विरोध नहीं करेगी।
भाजपा के लिए माना जाता है कि वह चुनावों के लिए अब ऐक्शन मोड में ही रहती है। इसके पीछे कारण भी है। दो सांसदों और एक-दो राज्यों तक ही सीमित रहने वाली भाजपा आज अपने दम पर 303 सांसद लेकर लोकसभा में सत्ता की कुर्सियों पर बैठी है। भाजपा और उनके सहयोगी दलों ने प्रचण्ड जीत हासिल की है। दिल्ली की सातों संसदीय सीटों पर भाजपा ने एक बार फिर कब्जा कर लिया है। दिल्ली से ही सांसद प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने कहा भी है कि अब उनका लक्ष्य दिल्ली विधान सभा में जीत हासिल करना है। दिल्ली विधानसभा चुनाव 8 महीने बाद ही होने हैं और भाजपा ने इसके लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं। चुनाव जीतने के लिए भाजपा रणनीति बना रही है। इसके मद्देनजर लगातार बैठकें बुलाई जा रही हैं इन बैठकों में लोकसभा चुनाव में बूथवाइज कहां कमी रही है और वहां क्या काम करने की जरूरत है, इसको लेकर दिल्ली भाजपा के संगठन मंत्री सिद्धार्थन विधानसभा के नेताओं के साथ बैठक कर रहे हैं।
हैरानी सिर्फ इस बात की है कि भाजपा दिल्ली विधान सभा की सिर्फ 60 सीटों को ही जीतने का लक्ष्य क्यों बना रही है? इसके लिए गत 8 और 9 जून को बैठक बुलायी गयी थी, जिसमें इस बात पर चर्चा हुई थी कि किस सीट पर कैसा समीकरण तय किया जाए। भाजपा के चुनाव विश्लेषण के मुताबिक इस बार लोकसभा के चुनाव में दिल्ली की 65 विधानसभा सीटों पर बम्पर जीत हासिल हुई? जबकि पांच विधान सभा सीटों पर भाजपा कांग्रेस से पिछड़ गयी है। दिल्ली लोकसभा की सात सीटें हैं और हर लोकसभा क्षेत्र में 10 विधानसभा के क्षेत्र आते हैं। विधानसभा क्षेत्र वाइज बूथों पर पड़े वोटों का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि दिल्ली के 73816 बूथों पर भाजपा ने जीत हासिल की है लेकिन 10088 बूथों पर भाजपा की पराजय हुई। इन बूथों पर केजरीवाल की आम आदमी पार्टी तीसरे स्थान पर है जबकि कांगे्रस दूसरे नम्बर पर रही है। खास बात यह भी कि इन बूथों में ज्यादातर मुस्लिम बहुल इलाके हैं तो कुछ कलेक्टर इलाके भी हैं। इसी मामले को विधानसभा वार देखें तो भाजपा 70 में से पांच सीटों पर हार गयी है। दिल्ली मंे सात ऐसी विधान सभा सीटें हैं जहां अल्पसंख्यक मुसलमानों की आबादी ज्यादा है। भाजपा की हार सिर्फ पांच विधान सभा सीटों में हुई जबकि दो विधान सभा सीटों पर बहुत कम अंतर से भाजपा जीती है।
कांग्रेस की उम्मीद भी इन्हीं सीटों ने बढ़ाई है। भाजपा के कम प्रभाव वाली सात विधान सभा सीटें कांग्रेस अपनी झोली में आसानी से डाल सकती है। लोकसभा चुनाव में हताश कांग्रेस जहां नये कार्यकारी अध्यक्ष की तलाश में है, वहीं दिल्ली में तीसरे नम्बर से दूसरे नम्बर पर आयी कांग्रेस विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रही है। श्रीमती शीला दीक्षित ने सभी जिला अध्यक्षों और ब्लाक अध्यक्षों को निर्देशित किया था कि हर
विधानसभा से तीन-तीन नामों का पैनल भेजें। इस प्रकार 70 चेहरे जल्दी तैयार किये जाएंगे। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी खामोश नहीं बैठे हैं। उन्होंने लोेकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के साथ गठबंधन का प्रयास किया था लेकिन अब चुनाव की रणनीति बदल गयी है। केजरीवाल की सरकार ने दिल्ली में महिलाओं को मुफ्त मेट्रो सफर की सुविधा दी हैं हालांकि सरकार ने आॅटोरिक्शा का किराया बढ़ाकर जनता की नाराजगी भी मोल ली हैं इसके पीछे केजरीवाल सरकार ने आटो-रिक्शा चालकों और मालिकों को खुश किया है। इनकी संख्या करीब 90 हजार बतायी जाती है। इन आॅटो मालिकों और चालकों ने आम आदमी पार्टी को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राज्य के परिवहन मंत्री कैलाश गहलोत ने इसे ट्वीटर पर बताया कि केजरीवाल सरकार ने अपना प्रमुख वादा पूरा किया है।
इस प्रकार दिल्ली विधान सभा चुनाव में भाजपा को कांग्रेस से मुकाबला करना पड़ सकता है। कांग्रेस भले ही दिल्ली की सात मंे से एक भी सीट नहीं जीती लेकिन 6 सीटों पर कांग्रेस ही दूसरे नम्बर पर रही है। कांग्रेस को 2014 के चुनाव में 15.2 फीसद वोट मिले थे जबकि 2019 में 22.51 फीसद वोट मिले हैं। कांग्रेस के टारगेट पर वे सीटें हैं जहां भाजपा हारी है जैसे उत्तर-पूर्वी संसदीय सीट में विधान सभा सीट सीलमपुर, पूर्वी दिल्ली संसदीय क्षेत्र में ओखला विधान सक्षा क्षेत्र और चांदनी चैक संसदीय क्षेत्र के तहत तीन विधान सभा क्षेत्र मरिया महल, चांदनी चैक और बल्ली मारान विधान सभा सीट प्रमुख है आम आदमी पार्टी भी इन्हीं सीटों पर ज्यादा जोर देगी। इसलिए मुकाबला रोचक होगा। इस रोचकता को जद(यू) और बढ़ाएगा। उसका सीधा मुकाबला भाजपा से होगा। (हिफी)

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