अल्मोड़ा के वैज्ञानिक मॉडल तैयार करने में जुटे,बादल कब और कहां फटेगा अब पता लग सकेगा

अब बादलों पर भी नजर रखी जाऐगी, वैज्ञानिक माॅडल तैयार करने के बाद बादल फटने जैसी प्राकृतिक घटना से होने वाले नुकसान से बचा जायेगा। वैदर माॅनीटरिंग नेटवर्किग तकनीक से यह संभव होगा, इसकी शुरूआत हिमालयी राज्या में से हिमाचल से की जायेगी। विकास संस्थान एवं गोविंद बल्लभ पंत हिमालयन पर्यावरण कोसी कटारमल अल्मोडा के वैज्ञानिक इस माॅडल को तैयार करने में जुटे हुए है।

उत्तराखंड को इसका लाभ भूगर्भीय व प्राकृतिक लिहाज से अतिसंवेदनशील समेत सभी राज्यों को मिलेगा। इन सब सवालों के जवाब अब जल्द मिल सकेंगे।बादलों में नमी कितनी है। किस ओर कितने बादल जमा हो रहे और बादल फटने की घटना कब व कितनी देर में कहां होगी। साथ ही बादल फटने के बाद होने वाली तबाही से काफी हद तक बचाव होगा। जीबी पंत हिमालयन पर्यावरण शोध एवं विकास संस्थान कोसी कटारमल के वैज्ञानिक इस प्रयोग को सफल बनाने के लिए रात दिन जुटे हैं। इसके लिए अत्याधुनिक मॉडल ‘वैदर मॉनीटरिंग नेटवर्किंग सिस्टम’ तैयार कर रहे है। हिमाचल में इसकी बकायदा शुरुआत की जा चुकी है इस मॉडल के प्रयोग में वैज्ञानिक पहले चरण में पहुंच गए हैं। नेटवर्किंग के मूर्तरूप ले लेने के बाद बादल फटने की घटनाओं के बाद जानमाल की क्षति को रोकने में बड़ी मदद मिलेगी। 

पर्वतीय इलाकों में इसलिए फटते हैं बादल 

वैज्ञानिकों की मानें तो पर्वतीय क्षेत्रों में 15 किमी की ऊंचाई पर बादल फटने की घटनाएं होती हैं। पानी से भरे बादल पहाडिय़ों में फंसे रह जाते हैं। फिर एक ही जगह पर पूरी ताकत से कुछ सेकंड में दो सेमी से ज्यादा बरसते हैं,  अत्यधिक नमी लेकर बादल एक स्थान पर जमा हो जाते हैं। तब पानी की बूंदें आपस में मिलने लगती हैं। इस प्रक्रिया के बाद बादलों का घनत्व इतना बढ़ जाता है कि अचानक अतिवृष्टि के रुप में एक ही स्थान पर बरसने लगते हैं। जो पलक झपकते ही सैलाब की शक्ल ले तबाही लाते हैं। 

वैदर मॉनीटरिंग नेटवर्किंग रखेगा नजर 

प्रो. किरीट कुमार, वरिष्ठ शोध वैज्ञानिक जीबी पंत हिमालयन पर्यावरण विकास एवं शोध संस्थान कोसी कटारमल अल्मोड़ा ने बताया कि वैदर मॉनीटरिंग नेटवर्किंग बादलों की स्थिति पर नजर रखने में कारगर रहेगा। संस्थान के वैज्ञानिक हिमाचल में मॉडल तैयार कर रहे हैं। अभी यह शुरुआती चरण में है। इसके तैयार होने के बाद हमें पहले ही पता लग जाएगा कि कब कहां बादल फट सकते हैं। इससे बचाव के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा और जानमाल की क्षति को कम किया जा सकेगा। 

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