नीतीश पर भी सवाल खड़े कर गये अजय

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के प्रमुख घटक जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) असहज स्थिति में दिखाई पड़ रहा है। इस हालात को जद(यू) के नेता केसी त्यागी छिपाना भी चाहते हैं लेकिन अपनी नाराजगी को भी जता नहीं पाते। केन्द्र सरकार में भागीदारी से अलग होने से यह स्पष्ट हो गया कि नीतीश कुमार उस व्यवहार को पसंद नहीं करेंगे, जो राजग के घटक दलों के साथ भाजपा कर रही है। हालांकि भाजपा ने अपने घटक दलों का पूरा सम्मान किया है और उन्हें अहसास नहीं होने दिया कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को इतने सांसद मिल गये जिससे सरकार बनाने के लिए किसी की मदद की जरूरत नहीं है। पिछली बार अर्थात् 2014 में भी भाजपा को अपने दम पर इतने सांसद मिल गये थे कि वो सहयोगी दलों को किनारे रखकर सरकार बना लेती। उस समय भी भाजपा ने सहयोगी दलों को भागीदार बनाया और इस बार भी सभी घटक दलों को प्रतिनिधित्व दिया। इस बार का प्रतिनिधित्व प्रतीकात्मक था और जद(यू) को यह मंजूर नहीं हुआ। बहरहाल नीतीश कुमार और केसी त्यागी ने बिहार में सरकार का उदाहरण देकर अपना विरोध जताया लेकिन आश्वासन दिया कि जद(यू) राजग के साथ ही रहेगा। शर्त लगा दी कि सिर्फ बिहार में। यह तनाव दूर भी नहीं हुआ था कि जद(यू) के प्रवक्ता अजय आलोक ने बीएसएफ पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया जबकि गृहमंत्री अमितशाह सीमा सुरक्षा बल की तारीफ कर चुके हैं। जद(यू) के सामने एक बार फिर असहज स्थिति पैदा हो गयी। अजय आलोक ने अपनी पार्टी के असमंजस को समझा और प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने नीतीश कुमार पर भी सवाल खड़ा कर दिया और कहा कि वह उनके लिए शर्मिन्दगी का कारण नहीं बनना चाहते। इसका सीधा मतलब यह लगाया जा रहा है कि सरकार की आलोचना पर जद(यू) भी जुबान बंद रखे। अजय आलोक ने बीएसएफ को लेकर जो सवाल खड़ा किया है, उसे भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता।
जद(यू) के प्रवक्ता अजय आलोक ने पश्चिम बंगाल के अंदर सीमा पर बीएसएफ की मदद से बांग्लादेशी घुसपैठियों की धड़ल्ले से एंट्री को लेकर सवाल खड़े किये थे। उन्होंने सीधे-सीधे आरोप लगाया था कि सीमा पर बीएसएफ के अधिकारी पांच हजार रुपये रिश्वत लेकर बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारत में प्रवेश करवाते हैं। बांग्लादेश से भारत में अवैध रूप से आने वालों की पहचान के लिए ही राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर बनाया गया है। इसको लेकर पूर्वोत्तर के राज्यों में विवाद भी है। अभी असम का मामला ही नहीं सुलझ पाया। मोदी सरकार ने ऐलान कर रखा है कि इसे अन्य राज्यों में भी लागू किया जाएगा। पश्चिम बंगाल में बांग्ला देश से अवैध रूप से आने वालों की संख्या कहीं ज्यादा बतायी जा रही है। ये लोग सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के कट्टर समर्थक माने जाते हैं। भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमितशाह ने जब से गृहमंत्रालय संभाला है, तब से राज्यों में हलचल भी तेज हुई है। जम्मू-कश्मीर में परिसीमन की चर्चा होने लगी। इसी प्रकार पश्चिम बंगाल में अवैध लोगों को निकाले जाने की तैयारी हो रही है, तभी जद(यू) प्रवक्ता ने यह सवाल उठा लिया कि ये बांग्लादेशी बीएसएफ की मदद से आये हैं। यह बात ममता बनर्जी के फेवर में जाती है और गृहमंत्री अमितशाह के लिए यह मुसीबत का कारण बन सकती है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहे थे। अजय आलोक ने उनकी परेशानी को समझा और प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया।
अजय आलोक ने खुद अपने ट्वीटर हैण्डिल से इस बात की जानकारी दी है। उन्होंने अपने ट्वीटर अकाउंट पर लिखा है कि उन्होंने जेडीयू प्रवक्ता के तौर पर इस्तीफा दे दिया है क्योंकि उन्हें लगता है कि वो अच्छा काम नहीं कर रहे हैं। अजय ने पार्टी प्रवक्ता पद से इस्तीफा देने के पीछे कारणों पर भी प्रकाश डाला है। खुलकर तो अजय ने कुछ नहीं कहा लेकिन इतना संकेत किया कि पार्टी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार केलिए शर्मिन्दगी का कारण नहीं बनाना चाहते। नीतीश कुमार की चर्चा करके अजय आलोक ने यह संकेत दिया कि मोदी सरकार की कुछ बातों को जद(यू) पसंद नहीं करता है लेकिन उनके बारे में बोलता भी नहीं है। पश्चिम बंगाल को लेकर भाजपा ने कूटनीतिक जंग भी छेड़ी हुई है। जद(यू) प्रवक्ता के रूप में अजय आलोक ने 12 जून से अपने एक ट्वीट में ममता बनर्जी का बचाव किया था। उन्होंने केन्द्रीय पुलिस और प्रशासन तंत्र को भी कसने की जरूरत बतायी थी। अजय आलोक ने लिखा था कि सिर्फ ममता बनर्जी को कोसने से काम नहीं चलेगा, अपने तंत्र को भी कसने की जरूरत है, खासकर तब, जब अमितशाह देश के गृहमंत्री हों। अवैध इमिग्रेशन (घुसपैठ) पर रोक लगाना अति आवश्यक हो गया है। अजय आलोक ने यह भी कहा था कि अब नहीं होगा तो कब होगा। इस प्रकार जद(यू) के प्रवक्ता ने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष और देश के गृहमंत्री पर ही निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि अमितशाह को म्यांमार (वर्मा) और बंाग्ला देश सीमा पर तैनात ऐसे बीएसएफ अधिकारी जो सात-आठ वर्षों से वहीं पर जमें हैं, उनकी संपत्ति की जांच करानी चाहिए। माना जा रहा है कि अजय आलोक के इस रुख से भाजपा और जद(यू) में खटास पैदा हो गयी थी। तनातनी के कारण कुछ और भी हैं लेकिन अजय आलोक ने ऐसे हालात जरूर पैदा कर दिये थे जिससे नीतीश कुमार कोई त्वरित प्रतिक्रिया देते अथवा अपने प्रवक्ता को हटाते। अजय आलोक ने एक महत्वपूर्ण सवाल उछाल कर 13 जून को अपने पद से इस्तीफा दिया है।
इस सवाल को गृहमंत्री अमितशाह भी रद्दी की टोकरी में नहीं डाल सकते क्योंकि जद(यू) के प्रवक्ता के रूप में अजय आलोक ने यह आरोप लगाया था। आरोप बीएसएफ पर लगा है तो उसकी जिम्मेदारी गृहमंत्री अमितशाह पर भी आती है। जद(यू) के प्रवक्ता ने सीमा पर तैनात बीएसएफ अधिकारियों की सम्पत्ति की जांच कराने को कहा है। भाजपा इस तरह का जोखिम भरा कदम नहीं उठा सकती। सबसे महत्वपूर्ण मामला पश्चिम बंगाल का है, जहां भाजपा को लेकर एक नकारात्मक मुद्दा ममता बनर्जी को मिल जाएगा। पश्चिम बंगाल में हिंसा को लेकर राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। बैठक के लिए तृणमूल कांग्रेस, भाजपा सीपीआई और कांग्रेस को निमंत्रण भेजा गया था। राज्यपाल ने बैठक में पांच सुझाव रखे थे। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के प्रतिनिधि ने कहा कि वह मुख्यमंत्री और पार्टी सुप्रीमों ममता बनर्जी से बात करने से पहले राज्यपाल के सुझावों का समर्थन नहीं कर सकते। राज्यपाल ने कौन से सुझाव रखे थे इसका खुलासा भी किसी ने नहीं किया लेकिन सीपीआई पोलित ब्यूरो के सदस्य मोहम्मद सलीम ने यह आरोप जरूर लगाया कि भाजपा और तृणमूल कांग्रेस मिलकर राज्य में हिंसा फैला रहे हैं। इसके पीछे एक कारण बांग्ला देश के घुसपैठियों का मामला भी है और उस मामले में बीएसएफ की भूमिका पर सवाल भाजपा के सहयोगी दल जद(यू) ने ही लगाया है। इसलिए भाजपा को डिफेन्सिव रूख अपनाना पड़ सकता है। (हिफी)

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